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Harishankar Parsai

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Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई)

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हरिशंकर परसाई(Harishankar Parsai) का जन्म 22 अगस्त 1922 को होशंगाबाद जिले में हुआ था। हरिशंकर परसाई(Harishankar Parsai) हिंदी साहित्य में एक बहुत बड़ा नाम है , जो अपनी व्यंग्य विधा के लिए बहुत प्रसिद्ध है। बहुत ही साधारण और सीधे भाषा में व्यंग्य कर देना हरिशंकर परसाई(Harishankar Parsai) जी को बखूबी आता था। हरिशंकर परसाई(Harishankar Parsai) जी का जन्म 10 अगस्त 1995 को हुआ था लेकिन उनका काम , उनकी रचनायें , आज तक भी पढ़ी जा रही है , और हिंदी साहित्य में ये रचनाएँ आगे भी पढ़ी जाएँगी।

हरिशंकर परसाई(Harishankar Parsai) जी सिर्फ दूसरों के ऊपर ही नहीं बल्कि खुद के ऊपर भी व्यंग्य लिखा करते थे। उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा, देश , समाज , प्रथा , यहाँ तक कि खुद को भी नहीं। परसाई जी का एक निबंध है “लिटरेचर ने मारा तुम्हें” , जहाँ पर वो लिखते है कैसे उनके घर लक्ष्मी नहीं आती। इस निबंध का एक छोटा सा अंश यहाँ लिखा जा रहा –

” सात साल लगातार लक्ष्मी – पूजन का नतीजा यह निकला कि पिता जी का धंधा बिलकुल चौपट हो गया और लक्ष्मी का यह ‘भक्त’ मैट्रिक पास करके नौकरी ढूंढने निकल पड़ा। नौकरी भी की तो स्कूल – मास्टरी की। न इनकम की न एक्साइज़ की। फिर नौकरी छोड़कर स्वतंत्र व्यवसाय के क्षेत्र में आया, तो कहाँ आया ? न सीमेंट में , न गल्ले में , न हार्डवेयर में। साहित्य में ! मतिभ्रष्ट आदमी और क्या करेगा ?

लक्ष्मी अब इस मुहल्ले में आती भी हैं, तो दूर से मेरा नेमप्लेट पढ़कर सड़क उस बाजू हो जाती है। मोहल्ले के दो – चार घरों में बैठकर चली जाती है। किसी से पूछ भी लेती है – सुना है इस मुहल्ले में कोई एक बड़ा बेवकूफ रहता है। कुछ साहित्य – वाहित्य का वाहियात काम करता है। कोई बता देता है की हाँ , वह उधर रहता है। वह मुँह फेरकर चली जाती है।

मेरा एक दोस्त कहता है – तुम्हें लिटरेचर ने मारा परसाई।

मारा, बिलकुल मारा। पुस्तक लिखनेवाले से पुस्तक बेचनेवाला बड़ा होता है। कथा लिखनेवाले से कथावाचक बड़ा होता है। सृष्टि निर्माता से सृष्टि का टूटनेवाला बड़ा होता है।”

आप इतने ही अंश में देखिये कि कैसे परसाई जी ने बहुत साफ और सीधे तरीके से व्यंग्य किया है लेखकों की आय को लेकर। किस तरह उनकी जितनी कमाई होती है , उससे कही ज्यादा ऐसे प्रकाशक जो इनकी किताबें बेचते है , उनको होती है।

Premchand k Fate Joote ( प्रेमचंद के फटे जूते )

अभी मैं हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) जी की एक किताब पढ़ रही हूँ ” प्रेमचंद के फटे जूते”, दरसल ये ऊपर वाला अंश इसी किताब से था। क्या ही बढ़िया संचयन है इस किताब में परसाई जी के निबंधों का। मौका मिले तो पढियेगा। इसमें से एक व्यंग्य का शीर्षक “प्रेमचंद के फटे जूते” भी है।

परसाई जी “प्रेमचंद के फटे जूते” में अपनी एक विडम्बना समझाने की कोशिश कर रहे है। विडम्बना यूं कि उनके सामने प्रेमचंद जी की एक फोटो है , जिसमे प्रेमचंद जी अपनी पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे है। उस फोटो में सब कुछ सही है , कपड़े की टोपी , धोती – कुरता , दाहिने पैर का जूता लेकिन जैसे ही परसाई जी की नजर प्रेमचंद जी के बाएं पैर के जूते पर जाती है , परसाई जी की नजर उधर ही अटक जाती है। दिक्कत ये है प्रेमचंद जी के बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है जिससे उनकी अँगुली बाहर निकल गयी है।

परसाई जी सोचते है – फोटो खिंचाने की अगर ये पोशाक है , तो पहनने की कैसी होगी ? नहीं , इस आदमी की अलग – अलग पोशाकें नहीं होंगी – इसमें पोशाकें बदलने का गुड़ नहीं है। यह जैसा है , वैसा ही फोटो में खिंच जाता है। फिर परसाई जी फोटो में प्रेमचंद के चेहरे की तरफ देखते है और उनको दिखती है प्रेमचंद के चेहरे पर बड़ी बेपरवाही , बड़ा विश्वास और मुस्कान। परसाई जी कहते है ” यह मुस्कान नहीं है , इसमें उपहास है , व्यंग्य है।” यह कैसा आदमी है, जो खुद तो फटे जूते पहन कर फोटो खिंचा रहा है, पर किसी पर हंस भी रहा है!

परसाई जी इस निबंध के अंत में लिखते है –

तुम मुझ पर या हम सभी पर हंस रहे हो , उन पर जो उंगली छिपाये और तलुआ घिसाये चल रहे है , उन पर जो टीले को बरकाकर बाजू से निकल रहे है। तुम कह रहे हो – मैंने तो ठोकर मार – मारकर जूता फाड़ लिया , अँगुली बाहर निकल आयी , पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा , मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिंता में तलुवे का नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे ?

मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ , अंगुली का इशारा समझता हूँ , तुम्हारी व्यंग्य मुस्कान समझता हूँ !

बहुत ही सुन्दर है ये निबंध। बहुत तरीकों में। जिस तरह प्रेमचंद के फोटो की व्याख्या की गयी और उसके जरिये परसाई जी ने जो अपने व्यंग्य छोड़ें है , उसे पढ़ने में वाकई बहुत अच्छा लगा।

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