Aapka Bunty Book Review in Hindi
Aapka Bunty(आपका बंटी) Book review
आपका बंटी(Aapka Bunty) उन किताबों में से है जो मैंने काफी पहले पढ़ी थी , कक्षा 10 या 11 के करीब। तब से लगभग 12 – 13 साल हो गए लेकिन आज तक बंटी मेरी आँखों के सामने से गया नहीं है। जब कभी मन्नू भंडारी को याद करती हूँ या उनकी कोई किताब पढ़ती हूँ तो आपका बंटी की याद जरूर आती है। कहते भी है कि मन्नू जी की दो किताबें बहुत ही बढ़िया है , आपका बंटी(Aapka Bunty) और महाभोज। कालजयी उपन्यास है ये।
अभी मैंने आपका बंटी(Aapka Bunty) दुबारा से उठायी और मुझे वही भाव , शकुन की उलझन , बंटी का उदास दिल , फिर से दिखे। मुझे याद है बहुत पहले जब ये किताब पढ़ी थी मैंने तो उन दिनों ऐसा हो गया था कि मेरी पसंदीदा किताब आपका बंटी है। बंटी के हर आँसू में मेरे आँसू सम्मिलित थे और बंटी हर मुस्कराहट में मेरी मुस्कान। भावनाओं की इतनी तहों तक जाकर उनकों लिखना काबिल – ए – तारीफ है।

आपका बंटी(Aaapka Bunty) एक ऐसे बच्चे की कहानी है जो अपनी माँ के साथ रहता है। Bunty के मम्मी पापा अलग रहते है और दोनों में तलाक होने वाला है। पापा(Ajay) को लेकर बहुत सारे सवाल है bunty के मन में जो कि वो अपनी मम्मी से पूछ नहीं पाता जैसे कि पापा साथ क्यों नहीं रहते ? मम्मी – पापा में कुट्टी (कट्टी) है क्या ? मम्मी – पापा में कुट्टी है तो क्या वो ठीक नहीं हो सकती ? वैसे बंटी के पापा मिलने आते है , बंटी को घुमाते है , बहुत सारी चीजे दिलवाते है , लेकिन कभी साथ नहीं रहते।
बंटी के पापा कलकत्ता में रहते है और जब वे कलकत्ता की कहानियाँ सुनाते है तो बंटी के दिमाग में कलकत्ता शहर के तरह – तरह के चित्र उभरने लगते है।पापा कभी कलकत्ता चलने के बारे में पूछते है तो बंटी मना कर देता है। बंटी सपने जरूर देखता है , पापा के साथ रहने के बारे में भी सोचता है , पर मम्मा , मम्मा को छोड़कर बंटी कही नहीं जा सकता। बंटी की मम्मी शकुन , प्रिंसिपल है। शकुन बंटी को लेकर बहुत प्रोटेक्टिव है , और अजय के जाने के बाद से , बंटी ही उसका सब कुछ है।
शकुन और बंटी की ज़िन्दगी में बड़ा तूफ़ान तब से आता है जब अजय और शकुन की आखिरी पेशी होती है। अजय और शकुन का तलाक हो जाता है। अजय अपनी ज़िन्दगी में आगे बढ़ चुका होता है मीरा के साथ। वकील चाचा शकुन को भी सलाह देते है कि उसे भी अब ज़िन्दगी में आगे बढ़ जाना चाहिए।
शकुन को कहीं न कही लगता था कि उसके और अजय के बीच बंटी एक सेतु बन सकता है लेकिन इस तलाक के साथ शकुन की अजय को लेकर जो रही सही उम्मीद होती है वो भी ख़तम हो जाती है। उसकी आँखें अब ज्यादा उदास होती है। बंटी को लगता है वकील चाचा ने कुछ जादू किया है , कुछ बड़ा वाला गड़बड़ हुआ है उनके बाद तभी मम्मी इतनी उदास रहती है।
बंटी को इसके बाद से लगता है कि उसे मम्मी को खुश करना है , उसे समझदारी से मम्मी की सारी बातें माननी है। मन्नू जी ने जी तरह इन सबको लिखा है न ऐसा लगता है सामने घटित हो रहा है। आँखें गीली हो आती है। एक नन्हा बच्चा जो अपनी खेलने – कूदने की उम्र में इतनी समझदारी वाली बातें करें , जरूर ही उस पर कुछ बड़ी गुजरी होगी। इस वक्त इस समीक्षा को लिखते वक्त भी मेरी आँखों में कही न कहीं नमी जरूर है।
आपका बंटी(Aapka Bunty) का एक अंश
मैं यहाँ पर आपका बंटी(Aapka Bunty) का एक छोटा सा अंश लिखना चाहूंगी , तलाक और बनती के अचानक बड़ा होने के बीच जो घटा।
बंटी ने एक बार मम्मी से हिम्मत करके पूछा – “ममी , आज सवेरे तुम पापा के पास गयी थीं। वहां क्या हुआ ?”
“अब होने को बाकि ही क्या रह गया था ? बस , अब से तू मेरा बेटा है , केवल मेरा। भूल जा कि तेरे पापा …” और ममी का स्वर भिंच गया। उनसे कुछ बोलै नहीं गया।
ममी के रुंधे हुए स्वर और अंसुवाई आँखों ने बंटी को भीतर तक दहला दिया। पर ममी के प्रति सारे लाड़ – प्यार और उनके दुःख में दुखी होने के बावजूद एक क्षण को मन में यह बात जरूर आई – पापा को वह कैसे भूलेगा ? पापा तो उसे बहुत अच्छे लगते है।
कि एकाएक ममी फूट-फूटकर रो पड़ी। तकिये में मुँह गड़ा लिया। सवेरे से जिस आवेग को रोके बैठी थी , अचानक ही वह जैसे सारे बांध तोड़कर बह निकला। बंटी बुरी तरह सकपका गया। ममी को उसने रोते देखा है , पर उसके सामने कभी रोती नहीं , इस तरह तो कभी नहीं।
बंटी को कुछ भी समझ में नहीं आया कि वह क्या करे, कैसे ममी को चुप कराये। और जब कुछ भी समझ नहीं आया तो ममी के गले से लिपटकर खुद भी फफक – फफककर रो पड़ा। “मत रोओ ममी – रोओ मत -“
ममी का रोना बंटी को एकाएक बड़ा बना गया। बड़ा और समझदार। ममी की पापा से लड़ाई हो गई है , पक्कीवाली ! दोस्ती तो अब हो ही नहीं सकती। ममी ने खुद उसे बताया। बिलकुल ऐसे , जैसे बड़ों को बताया जाता है। साथ ही यह भी कि अब ममी के लिए जो भी है , बंटी ही है।
और ममी के एकमात्र सहारे बंटी के ऊपर जैसे हजार – हजार जिम्मेदारियाँ आ गयी है ममी को प्रसन्न रखने की। हर काम में ममी की मदद करने की। कोई भी ऐसा काम न करने की , जिससे ममी दुखी और परेशान हों। वह सब करेगा , करता भी है। पर बस , न चाहते हुए भी पापा की याद उसे आ जाती है। लेकिन नहीं , अब वह उनके दिए हुए खिलौनों से नहीं खेलता। कभी उनकी बात भी नहीं करता। ममी को शायद अच्छा न लगे।
रैक पर रखी हुई पापा की एकमात्र तस्वीर को भी उसने एक दिन चुपचाप उठाकर खिलौनों की अलमारी में बंद कर दिया – ममी से लड़ाई कर ली तो अब बैठो यहाँ , और क्या ? सारे दिन ममी को उदास रखनेवाले , रुलानेवाले पापा की यही सजा है , बस ! और उसे लगा जैसे ममी की ओर से उसने पापा के खिलाफ एक बहुत बड़ा कदम उठाया है।

आप बच्चे की मासूमियत देखो इसमें। किस कदर एक बच्चे के ऊपर तलाक का असर पड़ता है। बंटी न पापा को भुला सकता है और न मम्मी को दुखी कर सकता है और इन सब मनःस्थितियों के बीच उसे समझदार भी होना है। किस कदर एक बच्चे के अपनी खुद की भावनायें इन सबके बीच दब जाती है। कितना कुछ उनके दिमाग में चलता रहता है और कितना कम बच्चे बोल पाते और जता पाते है। शकुन को भी ये सब दिख रहा था। शकुन की उलझनों को भी नजरंअदाज नहीं किया जा सकता।
बंटी इन सबसे गुजर ही रहा होता है कि इससे भी बड़ा भूचाल उसकी ज़िन्दगी में आता है जब शकुन डॉक्टर जोशी को अपनी ज़िन्दगी में शामिल करने की कोशिश करती है। कहीं न कहीं बंटी इन सबमें कटा हुआ महसूस करता है और डॉक्टर जोशी को अपने पापा के रूप में स्वीकार नहीं कर पाता है। और इन सबके बीच जिस तरह एक चंचल बच्चा , एक डरे सहमे बच्चे में बदल जाता है उससे बड़ी तकलीफ पहुँचती है। पूरी कहानी पढ़ने के लिए आप जरूर आपका बंटी पढ़िए। मन्नू जी द्वारा लिखी बहुत अच्छी किताब है ये।
आपका बंटी(Aapka Bunty) में जी विषय को उजागर किया है , वो बहुत ही महत्वूर्ण विषय है। तलाक और तलाक के बाद बच्चे के ऊपर क्या असर पड़ता है , ये बहुत ही महत्वपूर्ण और सेंसिटिव विषय है। एक और भी विषय जिसके बारे में बात किया जा सकता है कि वो ये कि कैसे शकुन इन सबके बीच इतनी उलझनों में थी। कैसे उसके लिए आगे बढ़ पाना बहुत कठिन था और फिर तलाक के बाद दुबारा से शादी करने के बाद लोगों की बातें सुननी पड़ी। तो तलाक के बाद शादी करने के बाद जो कुछ दिक्कतें आती है सामने उसको भी थोड़ा बहुत समझा जा सकता है।
आपका बंटी(Aapka Bunty) का ज्यादातर भाग बंटी के लिए ही है। किस तरह बंटी महसूस करता है। कैसे उसको एडजस्ट करने में दिक्कत होता है। अपने घर को छोड़ना , अपने बगीचे को छोड़ना , ये सब बंटी के लिए कितना कष्टदायक होगा। कैसे बंटी के मन में तरह – तरह के ख्याल आते है जैसे ममी पर कोई जादू हुआ है , डॉक्टर जोशी ने ममी को जादुई शीशी दी है। कैसे बंटी उस शीशी से सारा इत्र गिरा आता है। आपका बंटी का कुछ भाग शकुन के लिए भी है। शकुन खुद को पूरी तरह खोना नहीं चाहती और चाहकर भी वो बंटी के मन से वो सारे डर नहीं निकल पाती।
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महाभोज किताब की समीक्षा हिंदी में पढ़ें – मन्नू भंडारी का महाभोज (Mahabhoj)
एक तलाक का बहुत गहरा असर किसी बच्चे पर पड़ सकता है ये आपका बंटी(Aapka Bunty) पढ़ कर बखूबी समझ आता है।पति पत्नी तो अलग हो जाते है लेकिन बच्चे की मनःस्थिति का क्या? ऐसा नहीं है कि आपका बंटी एक कहानी है तो बस ये कहानी में ही होता होगा बल्कि असलियत में इसका सच्चाई से भी वास्ता है। और अगर आप कहानी शुरू होने के पहले , मन्नू जी ने जो बंटी की जन्मपत्री लिखी है उसको पढ़कर भी पता चलता है कि ये कहानी कही नहीं कहीं से तो प्रेरित तो है ही।
आपका बंटी(Aapka Bunty) की भाषा – शैली बहुत आसान है। बहुत अच्छे विषय पर लिखी गयी है और बहुत गहराई तक में जाकर लिखी है। अगर आप हिंदी की किताबें पढ़ते है और अभी तक आपका बंटी(Aapka Bunty) नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़िए। और अगर आप आपका बंटी(Aapka Bunty) पढ़ लिए है तो अपने विचार जरूर साझा करें।
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